Wednesday, September 12, 2018


प्यार में देखो हम भी धोखा खा गए,
बरसे सावन नैनों से वो याद आ गए।


हालत कैसी है उसको न फिकर मेरी,
देख ली मैंने वफा पत्थर दिल तेरी,
क्या दी थी वो कसमें, कैसे थे तेरे वादे,
दिल मेरा तड़प रहा है भीगी हैं मेरी आँखें,
आके झूठी बातों में धोखा खा गए,
बरसे सावन नैनों से वो याद आ गए।


चाहा था जिसको दिल से उसने ही ठुकरा दिया है,
की है बेवफ़ाई मुझसे दिल को बड़ा ग़म दिया है,
पी के जहर का प्याला खुद को भुलाया हमने,
मौत ने भी साथ छोड़ा बस ठोकर खाई हमने,
बेवफा पे करके यकीन धोखा खा गए,
बरसे सावन नैनों से वो याद आ गए।

Sunday, August 26, 2018

दिल से लगा के तेरी तस्वीर हम तो रोया करते हैं,

याद करते हैं तुझे पलकें भिगोया करते हैं,

दिल बहलाने के लिए काम अच्छा ढूंढा है,

बस तेरे ही ख्वाबों के मोती पिरोया करते हैं।


Monday, August 20, 2018

अपनी छड़ी के सहारे धीरे धीरे घर के मेन दरवाजे से मैं बाहर आया तो पता चला की आज ठंड बहुत ज्यादा है शायद इसीलिए आज घुटने का दर्द ज्यादा दुखी कर रहा था। पिछले पाँच सालों से ये दर्द मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया था। हिस्सा तो खैर बहुत कुछ बन गया है जिंदगी का लेकिन जो चाहा था बस वही मेरे हिस्सों में नहीं आया।

दरवाजा हल्का सा बंद करके सड़क पर पहुंचा तो ऑटो वाला आकर खड़ा हो गया ओर बोला - भैया जी आज तनिक लेट हो गए हो तबीयत ठीक तो है ? मैंने कहा - हाँ ठीक है बस ठंड की वजह से आज दर्द थोड़ा ज्यादा है तो चलने में दिक्कत हो रही है। ये कहकर मैं ऑटो में सरक गया ओर छड़ी एक ओर रखकर पीछे का सहारा लेकर बैठ गया।

ये ऑटो वाला भी उन्हीं हिस्सों में से एक था जिनके बारे में कभी सोचा भी न था। पिछले कुछ 35 सालों पहले इसके ऑटो में बैठा था ओर तब से मैं इसका परमानेंट ग्राहक बन गया। ऑटो वाले ने ऑटो स्टार्ट कर दिया ओर रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ा दिया। पिछले पैंतीस सालों से ये ऑटो वाला हर रविवार मुझे स्टेशन ले जाता ओर फिर 2 घंटों बाद वापस यहीं मेरे घर के सामने छोड़ जाता। हर रविवार को मैं एक उम्मीद लेकर जाता ओर उधर से मायूसी लेकर लौट आता लेकिन आज मेरे चेहरे पर उम्मीद कम ओर चिंता ज्यादा दीख रही थी। ऑटो वाला नोटिस करता था लेकिन कहता कुछ नहीं था।

आज ऑटो वाले ने हिम्मत सी करके पूछ ही लिया - भैया जी बुरा न मानो तो एक बात पूछें। मैंने कहा - हाँ बोलो।
मैं इतने दिनों से आपको स्टेशन ले जाता हूँ ओर फिर घंटे 2 घंटे बाद आप वापस आ जाते हो। स्टेशन पर कुछ काम धंधा करते हो क्या आप?
मैंने कहा - नहीं काम नहीं करता हूँ बस स्टेशन पर थोड़ी देर बैठना मुझे अच्छा लगता है।
ओहो, अच्छा - उसने कहा ओर फिर अपना ध्यान रास्ते पर लगा दिया। थोड़ी देर बाद हम स्टेशन पहुँच गए। ऑटो से उतरकर मैंने ऑटो वाले की ओर देखा तो वो बोला - भैया जी आप आराम से बैठो हम घंटे भर बाद आते हैं ओर ये बोलकर उसने ऑटो मोड़ दिया। मैं धीरे धीरे चलता हुआ सीढ़ियों के पास पहुँच गया। सीढ़ी चढ़ने की हिम्मत तो नहीं हो रही थी परंतु ओर कोई रास्ता भी न था।

पैंसठ साल की उम्र, घुटनों का दर्द ओर बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल इन तीनों ने मिलकर मुझे थका दिया था। काहीर हिम्मत करके मैं सीढ़ी चढ़ने लगा। चढ़ तो गया लेकिन सांस फूलने लगी ओर फिर अभी तो प्लेटफॉर्म नं 4 पर पहुँचकर उतरना भी था ओर वापस भी आना था। लेकिन पैर रुके नहीं ओर मैं हाँफता हुआ प्लेटफॉर्म 4 की एक खाली बेंच पर बैठकर साँसों को दुरुस्त करने लगा। इसी बीच में मुझे ऑटो वाले की बात याद आई की मैं यहाँ क्यूँ आता हूँ ओर मेरी आँखों के आगे 35 साल पुरानी वो बातें घूमने लगीं।

रोहन मेरा डॉक्युमेंट्स वाला बैग नहीं मिल रहा प्लीज़ हेल्प करो न ढूंढने में - सीमा ने कहा। ठीक है ढूँढता हूँ - ओर मैं उसका बैग खोजने लगा जो मुझे कुर्सी पर रखे कपड़ों के ढेर में मिला। ये लो बैग ओर जल्दी करो ट्रेन छूट जाएगी तुम्हारी फिर मुझे मत कोसना, मैंने बैग सीमा को देते हुये कहा। बस दो मिनट ओर लगेंगे - उसने कहा। उसके ये दो मिनट पिछले तीन घंटों से जारी थे। खैर दो मिनट बाद वो सामान उठाए हुये मेरे पास आई ओर बोली रोहन जल्दी से ऑटो वाले को बुलाओ न। मैं बाहर सड़क की ओर भागा ओर एक ऑटो वाले को पकड़ लाया। सीमा की मम्मी ओर पापा ने मुझसे कहा बेटा रोहन तुम इसको छोड़ आओगे या हम भी साथ चलें। मैंने कहा - अरे आंटी आप आराम से बैठो परेशान मत हो मैं छोड़ आऊँगा ओर हम दोनों फटाक से ऑटो में घुस गए ओर ऑटो वाला चल पड़ा स्टेशन की ओर।

सीमा मेरी बचपन की दोस्त थी। हम दोनों एक ही स्कूल में साथ साथ पढे थे ओर फिर कॉलेज भी साथ ही किया था। हम दोनों एक दूसरे को पसंद करते थे ओर जॉब लगने के बाद शादी के बारे मे सोच रहे थे। सीमा के घर वालों को कोई ऐतराज न था पर उनकी शर्त थी की पहले दोनों अपने पैरों पर खड़े हो जाओ। मेरे घर वाले भी राजी थे। कुछ समय बाद मेरी जॉब लग गई दिल्ली की एक एमएनसी कंपनी में  ओर आज सीमा भी ऑफिस जॉइन करने के लिये निकल रही थी उसका सिलेक्शन एक अच्छी सरकारी नौकरी के लिए हुआ था ओर अगले दिन सोमवार में उसे रिपोर्ट करना था। अगले रविवार को उसका वापस आना ओर फिर एक धमाकेदार पार्टी ओर हमारी सगाई का प्रोग्राम था।

हम दोनों स्टेशन पहुँच चुके थे मैंने जल्दी से सामान निकाला, ऑटो वाले को थोड़ी देर रुकने को कहा ओर जल्दी से स्टेशन की ओर भागे। टिकिट कनफर्म था ओर गाड़ी प्लेटफॉर्म नं 4 पर खड़ी थी ओर हम इस वक़्त दूसरी ओर यानि प्लेटफॉर्म नं 11 पर थे। बस फिर क्या था हम दौड़ पड़े ओर भागते भागते ट्रेन पकड़ी। सीमा को ट्रेन में बैठा दिया था ओर ट्रेन चल पड़ी थी सीमा ने मुझसे कहा - रविवार को सही समय पर आ जाना मुझे लेने, लेट मत होना। मैंने कहा ठीक है आ जाऊंगा। ट्रेन ने रफ्तार पकड़ ली थी। मैं तब तक खड़ा हुआ हाथ हिलाता रहा जब तक ट्रेन बिलकुल ओझल नहीं हो गई। फिर एक ठंडी सी आह भरकर मैं वापस आया ओर उसी ऑटो मैं बैठकर अपने घर चला गया।

अगले छः दिनों तक सीमा से मेरी ज्यादा बात नहीं हुई क्योंकि मैं भी व्यस्त था ओर वो भी। फिर रविवार आ गया। मैं घर पर ही था ओर जल्दी से तैयार होकर बाहर आकर ऑटो ढूंढने लगा। इत्तेफाक से वही ऑटो वाला मिल गया जो पिछले रविवार को हम दोनों को स्टेशन छोडकर आया था। मैंने उसको कहा - भाई जल्दी स्टेशन चलो। वो बोला - जी भैया जी। ओर ऑटो दौड़ पड़ा स्टेशन की तरफ।

ट्रेन प्लेटफॉर्म नं 4 पर ठीक 4:40 PM पर आनी थी ओर मैं 3 बजे ही प्लेटफॉर्म पर पहुँच चुका था ओर अब टाइम कट नहीं रहा था तो मैंने सीमा को फोन किया लेकिन उसका फोन मिला नहीं। मैंने ये सोचकर की शायद फोन मे सिग्नल नहीं आ रहे होंगे उसके पापा से बात करने लगा। कुछ समय बाद जहां मैं बैठा था वहाँ के स्पीकर में एक लड़की की आवाज सुनाई दी - यात्रीगण कृपया ध्यान दें दिल्ली से चलकर सियालदाह जाने वाली ट्रेन रास्ते में दुर्घटनाग्रस्त हो गई है। आप सभी से अनुरोध है ... इसके आगे के शब्द मुझे सुनाई नहीं दिये। मुझे चक्कर सा आ गया, मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया ओर मैं बेहोश होकर गिर पड़ा। जब होश आया तो खुद को हॉस्पिटल में लोगों से घिरा हुआ पाया। एक तरफ मेरे घरवाले थे ओर दूसरी तरफ सीमा के घरवाले। ऑटो वाला भी वहीं खड़ा था। घरवालों ने बताया की वही मुझे लेकर हॉस्पिटल आया था ओर उनको भी फोन किया था मेरे फोन से।

मैंने घरवालों से पूछा की सीमा कहाँ है कैसी है वो बोले की अभी पता नहीं चल सका की कहाँ है। उसका फोन भी नहीं मिल रहा। उसकी मम्मी का बुरा हाल था। फिर हम सबने मिलकर सब जगह पता किया सारे हॉस्पिटल छान मारे लेकिन सीमा कुछ पता नहीं चला। मेरी तो जैसे दुनिया ही खत्म हो गई थी। बहुत दिनों तक मैं सदमे मे रहा। सबने मुझे समझाया की हो सकता है की जब वो ठीक हो तो खुद ही फोन कर ले या घर आ जाए। धीरे धीरे मैं थोड़ा ठीक हुआ ओर फिर से सीमा की तलाश करने लगा लेकिन सब व्यर्थ। बस मन में एक उम्मीद थी की एक दिन वो जरूर आएगी। उसे कुछ नहीं हो सकता।

इसी उम्मीद मैं पिछले पैंतीस सालों से मैं हर रविवार स्टेशन जाता हूँ। ये ऑटो वाला ठीक 3 बजे मुझे लेने आ जाता है। ठीक 3:35 पर मैं प्लेटफॉर्म नं 4 पर पहुँच जाता हूँ। ट्रेन भी अपने समय पर ठीक 4:40 पर आ जाती है। बस तुम ही नहीं आती। 

Sunday, August 12, 2018


बहुत समय के बाद आज अपने गाँव आया था। शहर की चकाचौंध से दूर। बीवी बच्चे भी साथ ही थे। सबकी छुट्टियाँ थीं और बच्चों की ज़िद भी थी गाँव घूमने की क्योंकि बचपन में हो वो आए थे जब पिताजी उनको गर्मियों की छुट्टी में बुला लेते थे। बच्चों के बहाने से मैं भी एक दो दिन के लिए घर आ जाता था। प्राइवेट नौकरी और मैनेजर की नौकरी में काम ज्यादा ओर छुट्टी कम ही मिलती थी। 

जैसे ही मेन रोड से गाड़ी को दाईं ओर मोड़ा उस पुराने आम के पेड़ के नीचे गाँव के पुराने प्रधान जी मिल गए। नई महंगी गाड़ी की ओर उन्होने ध्यान से देखा ओर मुझे ध्यान से देखने लगे मगर पहचान नहीं पाये। ये देखकर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई और मैंने गाड़ी को एक तरफ रोक लिया और गाड़ी से उतरकर उनकी तरफ बढ़ा। बच्चे भी गाड़ी से बाहर आ गए। मैंने प्रधान जी को नमस्कार किया और अपना परिचय दिया। वो पहचान गए और मुझे अपने गले से लगा कर बोले - "लल्ला बहुत दिनों बाद आए हो आज कैसे गाँव का रास्ता भूल गए?" 

खैर थोड़ी देर उनसे बात करके हम वापिस गाड़ी में बैठे और घर की और चल दिये। रास्ते में कुछ चीजें वैसी ही थीं लेकिन बहुत कुछ बदल चुका था। सड़क पक्की बन गयी थी। दोनों तरफ पक्की नालियाँ, एक नया मंदिर भी बन गया था ओर उसके ठीक सामने जो चौपाल थी जहां शाम में गाँव के बुजुर्ग लोग हुक्का गुड़गुड़ाते थे अब एकदम शानदार दीख रही थी। एक मोड लेकर और तीन मकान छोडकर हमारा घर आ गया था। घर पहुँचकर मैंने गाड़ी रोकी और उतरकर चाभी से ताला खोला और दरवाजा खोलकर गाड़ी अंदर की। 

अंदर जाकर देखा तो सारे घर में गंदगी जमा थी। बहुत समय से सफाई हुई ही नहीं थी। करता भी कौन? जब तक माँ रही उन्होने कभी घर मे एक जाला भी न लगने दिया। जब वो दुनिया से गईं तो कुछ दिन कोमल (मेरी पत्नी) ने घर की देखभाल की ओर फिर हमको वापिस शहर जाना पड़ा क्योंकि काम तो सारा वहीं था। पहले हम दो तीन महीने में आते भी रहे लेकिन कुछ समय बाद व्यस्तता बढ़ गई ओर हम दोनों ही घर का रास्ता भूल गए। अंदर कमरों में भी जाले लगे हुये थे। कोमल ने कहा मुझे आज बहुत मेहनत करनी पड़ेगी तुम थोड़ी देर कहीं घूम आओ तब तक मैं सफाई कर लेती हूँ। मैंने कहा की जब सफाई करनी ही है तो साथ में मिलकर कर लेते हैं जल्दी काम निपट जाएगा। फिर हिस्सेदारी बाँट दी गयी। बाहर बरामदे की ज़िम्मेदारी दोनों बच्चों ने ले ली, दो कमरों की ज़िम्मेदारी कोमल ने लेली और पिताजी के कमरे की सफाई का जिम्मा मुझे मिला। 

पिताजी के कमरे की हालत देखि नहीं गई। जब माँ थी तो मजाल थी किसी की कोई एक चीज भी इधर से उधर हो जाए। पिताजी को अपनी सारी चीजें वहीं मिलती थीं जहां उनको होना चाहिए था। पहले मैंने जाले साफ किए और फिर झाड़ू लेकर फर्श साफ करने लगा। झाड़ू लगाते लगाते जब पिताजी की किताबों की अलमारी के नीचे झाड़ू गई तो वो किसी चीज से अटक गई। मैंने पूरा ज़ोर लगाया लेकिन वो चीज पता नहीं क्या थी, खिसक ही नहीं रही थी। थक हार कर मैं अलमारी को एक तरफ किया और जैसे ही नीचे देखा तो वो पिताजी के जूते थे। 

ये वही जूते थे जिन्हें पिताजी बड़े मन से पहनते थे। चमड़े के काले जूते उन्होने कानपुर से मँगवाए थे और बड़े ध्यान से उनको पोलिश किया करते थे। ये वही जूते थे जिन्हें बचपन में मैं पहन कर चलने की कोशिश करता था और अक्सर गिर जाने की अवस्था में आ जाता था लेकिन गिरने से पहले ही पिताजी लपककर मुझे सम्हाल लेते थे और कहते थे - "सम्हाल कर बेटे, आराम से"। 

वो बात याद आते ही मैंने वो जूते बाहर निकाले उनको झाड़ा, एक कपड़े से पोंछा और पोलिश ढूंढकर उनको पोलिश किया। पोलिश होते ही वो नए जूतों की तरह चमक उठे। मुझसे रहा नहीं गया और बचपन की तरह उन जूतों को पहन लिया ओर खड़ा होकर चलने लगा। जैसे ही पहला कदम बढ़ाया पैर के नीचे झाड़ू आ गयी और मैं लड़खड़ा गया और लड़खड़ाते ही कानों में आवाज आई - "सम्हाल कर बेटे, आराम से"। 

मैं तेजी से पीछे मुड़ा लेकिन पीछे पिताजी नहीं थे हाँ पीछे की दीवार पर उनकी मुसकुराती हुई एक धुंधली सी तस्वीर टंगी हुयी थी। बचपन से लेकर पिताजी के जाने तक की सारी बातें  फिल्म की तरह मेरी आँखों के सामने से गुजरने लगीं। मेरी आँखों में आँसू आ गए थे। मैं रो रहा था। पिताजी को याद करके, उनके प्यार को याद करके। 

आज पिताजी तो नहीं हैं लेकिन उनके जूते मैंने अपने पास रख लिए। उनकी एक बेहतरीन निशानी जो मेरे लिए अनमोल है। जब भी उनकी याद आता है मैं उनके जूते पहन लेता हूँ और अकेला टहलने निकाल जाता हूँ। 

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